69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती का विवादित मसला गर्मांया प्रश्नों का विवाद बना उलटफेर का कारण।
दरअसल मामला बेसिक शिक्षा परिषद के प्राथमिक विद्यालयों में 69 हजार सहायक अध्यापकों की भर्ती के लिए छह जनवरी 2019 को लिखित परीक्षा कराई गई थी। परीक्षा करीब चार लाख अभ्यर्थियों ने
दी थी। परीक्षा के बाद सरकार ने भर्ती का कटऑफ सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी के लिए 65 प्रतिशत और आरक्षित वर्ग के लिए 60 प्रतिशत की अनिवार्यता के साथ तय की थी। इस आदेश को लेकर अभ्यार्थियों ने हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में चुनौती दी थी।
शिक्षक भर्ती में विवाद वजाह अपनी जगह है , पर उन 69 हजार अभ्यर्थियों की पीड़ा समझी जा सकती है जिनकी सहायक अध्यापक पद पर भर्ती प्रक्रिया उच्च न्यायालय के आदेश पर उस वक्त रोक देनी पड़ी , जब ये अभ्यर्थी काउंसिलिंग के लिए निर्धारित केंद्रों पर पहुंचकर औपचारिकताएं पूरी कर रहे थे।
इन पदों की चयन प्रक्रिया करीब दो साल से चल रही है । इस बार उम्मीद थी कि यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी , पर उच्च न्यायालय ने कुछ अभ्यर्थियों की याचिका स्वीकार करके भर्ती प्रक्रिया रोकने का आदेश दे दिया।
दरअसल , इस भर्ती की लिखित परीक्षा में पूछे गए कुछ सवालों के जवाबों पर शुरू से आपत्तियां आ रही थीं ।
इसे लेकर कई अभ्यर्थी उच्च न्यायालय पहुंच गए । न्यायालय ने आदेश दिया कि आपत्तियों पर यूजीसी का मत लिया जाए । शासन इस आदेश को डबल बेंच में चुनौती देने की तैयारी कर रहा था । वैसे अभ्यर्थियों की संतुष्टि के लिए यूजीसी जैसी किसी तटस्थ संस्था का मत प्राप्त करना भी पारदर्शी तरीका है।
यह शुभ संकेत है या अशुभ कि मौजूदा शासनकाल में भर्ती परीक्षाओं में भ्रष्टाचार की शिकायतों का अंबार लगा रहा। करीब 13 प्रकार की गड़बड़ियां थी।इन्हीं गड़बड़ियों को लेकर विवाद शुरू हो चुका है।
कल ही सपा प्रदेश अध्यक्ष निषाद जी ने भी शिक्षक भर्ती पर सवाल उठाया उन्होंने कहा कि प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों की भर्ती में ओबीसी,एससी की तम्म जातियों के साथ सरकार ने सोची समझी साजिश के तहत अन्याय व हकमारी किया है।
सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा विवाद के बाद एक बार फिर एक ऐसी राज्य स्तरीय शासकीय भर्ती एजेंसी की जरूरत महसूस की जा रही है जो प्रोफेशनल तरीके से सरकारी विभागों के लिए गैर राजपत्रित कार्मिकों का पारदर्शी ढंग से चयन करे।
फिलहाल अधिकतर विभाग अपनी भर्ती प्रक्रिया चलाते हैं जिससे विसंगतियां सामने आती हैं । हर बाधा और विवाद का खमियाजा अंततः उन अभ्यर्थियों को भुगतना पड़ता है जो गड़बड़ियों के लिए कतई जिम्मेदार नहीं होते । यदि यूजीसी के निष्कर्ष के आधार पर सहायक शिक्षक भर्ती की मेरिट बदलती है तो उन मौजूदा चयनित अभ्यर्थियों की हताशा का अनुमान किया जा सकता है जो नई चयन सूची से बाहर हो जाएंगे।
दी थी। परीक्षा के बाद सरकार ने भर्ती का कटऑफ सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी के लिए 65 प्रतिशत और आरक्षित वर्ग के लिए 60 प्रतिशत की अनिवार्यता के साथ तय की थी। इस आदेश को लेकर अभ्यार्थियों ने हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में चुनौती दी थी।
शिक्षक भर्ती में विवाद वजाह अपनी जगह है , पर उन 69 हजार अभ्यर्थियों की पीड़ा समझी जा सकती है जिनकी सहायक अध्यापक पद पर भर्ती प्रक्रिया उच्च न्यायालय के आदेश पर उस वक्त रोक देनी पड़ी , जब ये अभ्यर्थी काउंसिलिंग के लिए निर्धारित केंद्रों पर पहुंचकर औपचारिकताएं पूरी कर रहे थे।
इन पदों की चयन प्रक्रिया करीब दो साल से चल रही है । इस बार उम्मीद थी कि यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी , पर उच्च न्यायालय ने कुछ अभ्यर्थियों की याचिका स्वीकार करके भर्ती प्रक्रिया रोकने का आदेश दे दिया।
दरअसल , इस भर्ती की लिखित परीक्षा में पूछे गए कुछ सवालों के जवाबों पर शुरू से आपत्तियां आ रही थीं ।
इसे लेकर कई अभ्यर्थी उच्च न्यायालय पहुंच गए । न्यायालय ने आदेश दिया कि आपत्तियों पर यूजीसी का मत लिया जाए । शासन इस आदेश को डबल बेंच में चुनौती देने की तैयारी कर रहा था । वैसे अभ्यर्थियों की संतुष्टि के लिए यूजीसी जैसी किसी तटस्थ संस्था का मत प्राप्त करना भी पारदर्शी तरीका है।
यह शुभ संकेत है या अशुभ कि मौजूदा शासनकाल में भर्ती परीक्षाओं में भ्रष्टाचार की शिकायतों का अंबार लगा रहा। करीब 13 प्रकार की गड़बड़ियां थी।इन्हीं गड़बड़ियों को लेकर विवाद शुरू हो चुका है।
कल ही सपा प्रदेश अध्यक्ष निषाद जी ने भी शिक्षक भर्ती पर सवाल उठाया उन्होंने कहा कि प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों की भर्ती में ओबीसी,एससी की तम्म जातियों के साथ सरकार ने सोची समझी साजिश के तहत अन्याय व हकमारी किया है।
सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा विवाद के बाद एक बार फिर एक ऐसी राज्य स्तरीय शासकीय भर्ती एजेंसी की जरूरत महसूस की जा रही है जो प्रोफेशनल तरीके से सरकारी विभागों के लिए गैर राजपत्रित कार्मिकों का पारदर्शी ढंग से चयन करे।
फिलहाल अधिकतर विभाग अपनी भर्ती प्रक्रिया चलाते हैं जिससे विसंगतियां सामने आती हैं । हर बाधा और विवाद का खमियाजा अंततः उन अभ्यर्थियों को भुगतना पड़ता है जो गड़बड़ियों के लिए कतई जिम्मेदार नहीं होते । यदि यूजीसी के निष्कर्ष के आधार पर सहायक शिक्षक भर्ती की मेरिट बदलती है तो उन मौजूदा चयनित अभ्यर्थियों की हताशा का अनुमान किया जा सकता है जो नई चयन सूची से बाहर हो जाएंगे।
उन्हें पूछने का हक होगा कि प्रश्नपत्र तैयार करने या अन्य गड़बड़ियों की सजा उन्हें क्यों मिली ? उम्मीद है कि राज्य सरकार संवेदनशीलता दिखाते हुए कोई ऐसा उपाय तलाशेगी जो सभी अभ्यर्थियों की शंकाओं का समाधान कर सके।
